आज कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता कि मैं सुखी हूं या मुझे किसी भी प्रकार का दुख नहीं है चाहे वह शारीरिक हो या फिर मानसिक
परमात्मा कहते हैं "तन धर सुखिया कोई नहीं देख्या, जो देख्या सो दुखिया हो, उदय अस्त की बात करत है, मैंने सब का किया विवेका हो।।" आज कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता कि मैं सुखी हूं या मुझे किसी भी प्रकार का दुख नहीं है चाहे वह शारीरिक हो या फिर मानसिक .... सच्चाई तो यह है कि परमात्मा कहते हैं कि मनुष्य शरीर धारी प्राणी ऐसा कोई भी मैंने नहीं देखा जो दुखी नहीं हो... फिर भी प्राणी स्वयं को सर्वे सर्वा मान बैठा है... और इस अभिमान में उसने परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकार दिया है.... आज विज्ञान और अनुसंधान का दम भरने वाले मनुष्य की बोलती क्यों बंद है जब एक छोटे से वायरस ने इसकी नाक में दम कर रखा है दुनिया भर के साइंटिस्ट इसके आगे हार चुके हैं... विश्व की नंबर वन मेडिकल फैसिलिटी वाले देश जैसे इटली और अमेरिका भी इसके सामने घुटने देख चुके हैं... व्यक्ति को एहसास हो चुका है मनुष्य अपने आपको सर्वे सर्वा मान पर बैठा है यह उसकी सबसे बड़ी भूल है... मनुष्य की तो औकात इतनी ही है कि अगर वह चल फिर रहा है और ठीक-ठाक है तो इतना घमंड में चूर रहता है कि मैं इतने बंगले बना दूंगा इतनी कार खरीद लू...