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श्री विष्णु जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि मेरा (विष्णु का) श्री ब्रह्मा का तथा श्री शिव का आविर्भाव यानि जन्म तथा तिरोभाव यानि मरण होता है।

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श्री देवी महापुराण के तीसरे स्कंद के अध्याय 4.5 पृष्ठ 138 की सम्बन्धित प्रकरण की फोटोकॉपी यह फोटोकॉपी श्री देवी पुराण की है। इसमें श्री विष्णु जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि मेरा (विष्णु का) श्री ब्रह्मा का तथा श्री शिव का आविर्भाव यानि जन्म तथा तिरोभाव यानि मरण होता है। इसी फोटोकॉपी में यह भी प्रमाणित है कि इन तीनों को जन्म देने वाली भी देवी दुर्गा जी यानि अष्टांगी है। हिन्दू धर्म के अज्ञानी धर्मगुरू कहते हैं कि इनके कोई माता-पिता नहीं हैं। सइ प्रकार की अनेक मिथ्या कथाऐं शास्त्रों के विपरित बताकर इन अज्ञानियों ने हिन्दू समाज का बेड़ा गरक कर रखा है। हिन्दू धर्मगुरू कहते हैं कि श्री विष्णु जी सतगुण, श्री शिव जी तमगुण व अन्य देवी-देवताओं की पूजा करो जबकि गीता में अध्याय 7 श्लोक 12.15 तथा 20.23 में कहा है कि इनकी पूजा करने वाले राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूर्ख हैं। हिन्दू धर्मगुरू श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी को ईश यानि सर्व के स्वामी बताते हैं जबकि श्री शिव महापुराण में विद्यवेश्वर संहिता भाग-1 पृष्ठ 17...

कोई उसे भगवान कहता है कोई उसे अल्लाह कहता है कोई उसे गॉड कहता है कोई उसे वाहेगुरु कहता है..

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मनुष्य पर जब भी कोई विपदा आती है और वह पूरी तरह से उस विपदा से निकलने में असमर्थ हो जाता है  तब  वह मनुष्य उस परमपिता को याद करता है कोई उसे भगवान कहता है कोई उसे अल्लाह कहता है कोई उसे गॉड कहता है कोई उसे वाहेगुरु कहता है.. .... व्यक्ति ने अपने जीवन काल में अपने समाज से और अपने परिवार से बड़े बुजुर्गों से जो भी कुछ सीखा है उस आधार पर वह भक्ति साधना करने का प्रयास करता है  अपने दुखों के निवारण हेतु..... कोई मंदिरों में  जाता है तो कोई दरगाह कोई गुरुद्वारों में जाता है तो कोई चर्च में... उस परम शक्ति की तलाश में जो उनके दुख निवारण कर सके... और यह सब वह अपने समाज और अपने से बड़ों की देखा देखी ही करता है..., समाज और बड़ों ने भी तो देखा देखी ही यह सब साधना शुरू की... पर क्या यह साधना यह भक्ति विधि सही है क्या मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे चर्च में जाने से भगवान की प्राप्ति हो सकती है... बुरा ना माने पर एक बात तो कहनी पड़ेगी भगवान कोई पशु तो नहीं है जिसे कोई मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे क्या चर्च में बांधकर रखें... वह तो सर्वत्र है जहां भी उसे आप अंतरात्मा से याद करो वह परमात्म...

आज कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता कि मैं सुखी हूं या मुझे किसी भी प्रकार का दुख नहीं है चाहे वह शारीरिक हो या फिर मानसिक

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परमात्मा कहते हैं "तन धर सुखिया कोई नहीं देख्या, जो देख्या सो दुखिया हो, उदय अस्त की बात करत है, मैंने सब का किया विवेका हो।।"  आज कोई भी मनुष्य यह नहीं कह सकता कि मैं सुखी हूं या मुझे किसी भी प्रकार का दुख नहीं है चाहे वह शारीरिक हो या फिर मानसिक .... सच्चाई तो यह है कि परमात्मा कहते हैं कि मनुष्य शरीर धारी प्राणी ऐसा कोई भी मैंने नहीं देखा जो दुखी नहीं हो... फिर भी प्राणी स्वयं को सर्वे सर्वा मान बैठा है... और इस अभिमान में उसने परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकार दिया है.... आज विज्ञान और अनुसंधान का दम भरने वाले मनुष्य की बोलती क्यों बंद है जब एक छोटे से वायरस ने इसकी नाक में दम कर रखा है दुनिया भर के साइंटिस्ट इसके आगे हार चुके हैं... विश्व की नंबर वन मेडिकल फैसिलिटी वाले देश जैसे इटली और अमेरिका भी इसके सामने घुटने देख चुके हैं... व्यक्ति को एहसास हो चुका है मनुष्य अपने आपको सर्वे सर्वा मान पर बैठा है यह उसकी सबसे बड़ी भूल है... मनुष्य की तो औकात इतनी  ही है कि अगर वह चल फिर रहा है और ठीक-ठाक है तो इतना घमंड में चूर रहता है कि मैं इतने बंगले बना दूंगा इतनी कार खरीद लू...

क्या हम इंसान कभी सुधरेंगे?

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क्या हम इंसान कभी सुधरेंगे? असमय आंधी-तूफान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से हम जूझ रहे हैं. पिछले 6 महीने से कोरोना नाम का एक वायरस हमारी नस्ल खत्म करने पर आमादा है. हम हर क्षण मर ही रहे हैं, लेकिन दुखद है कि हमारे पाप नहीं मर रहे हैं. हम इंसानों ने जंगल जलाए, नदियां सुखाईं, पहाड़ तोड़ दिए. अपनी लालच और हवस का शिकार पशु-पक्षियों को बना लिया. कब्र में पैर लटके हैं हमारे और श्मशान देव सिर पर मंडरा रहे हैं. इसके बाद भी एक गर्भवती मां के साथ हमने इतना क्रूर मजाक किया. कोरोना इसी तरह के कई पापों का श्राप है. क्या हम इंसान कभी सुधरेंगे? अभी भी समय है... सत भक्ति और सत्य ज्ञान को स्वीकार करो और खुद में सुधार करो और प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना बंद करो... सत भक्ति और पूर्ण संत का सत्संग ही अब कुछ सुधार ला सकता है.. इसके अलावा कोई उपाय है ही नहीं... आज मान लो या सर्वनाश होने के बाद में मान लेना... पर यह सत भक्ति और सत्य ज्ञान जब तक स्वीकार नहीं करोगे पूर्ण संत की शरण ग्रहण नहीं करोगे तब तक काल ऐसे ही सर्वनाश की ओर तुम्हें खींचे जाएगा... शास्त्र यह प्रमाणित करते हैं कि ब्रह्मा विष्णु ...

शास्त्र यह प्रमाणित करते हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश का भी जन्म और मृत्यु होती है अर्थात् यह भी नाशवान है

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शास्त्र यह प्रमाणित करते हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश का भी जन्म और मृत्यु होती है अर्थात् यह भी नाशवान है .... प्रमाण के लिए देखिए श्रीमद् देवी भागवत स्कंद 3, अध्याय 5...... फिर वह अविनाशी परमात्मा कौन है जो न जन्मता है ना मरता है शाश्वत है और वह कहां रहता है कैसा दिखता है कैसे मिलता है... यह सब जानकारी हमारे शास्त्र प्रमाणित करते हैं वेद पुराण कुरान बाइबल भगवत गीता गुरु ग्रंथ साहिब सभी  सद ग्रंथ यह प्रमाणित करते हैं कि परमेश्वर कबीर है वह साकार है अर्थात दिखाई देता है और नर आकार है और सतलोक में रहता है... तथा तत्वदर्शी संत से नाम उपदेश लेकर सत भक्ति करने से उस मालिक को पाया जा सकता है... श्रीमद्भगवद्गीता में तत्वदर्शी संत की पहचान भी बताई है कि जो संसार रूपी उल्टे लटके हुए वृक्ष को तत्व से जानता है वह तत्वदर्शी संत है जो शास्त्र अनुसार सद्भक्ति करवाता है और स्वयं भी करता है तथा अपने अनुयायियों में कोई भेदभाव नहीं करता जिसकी भक्ति शास्त्रों से मेल खाती है वही तत्वदर्शी संत है और वर्तमान में केवल एक ही तत्वदर्शी संत उपस्थित है संपूर्ण पृथ्वी पर और वह है जगतगुरु तत्वदर्शी संत राम...

कबीर परमेश्वर जी ने हनुमान जी को भी अपनी शरण में लिया और सद्भक्ति करवाकर सतलोक ले गए

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कबीर परमेश्वर जो 600 वर्ष पहले काशी में एक जुलाहे की भूमिका अदा कर के गए अनेकों लोगों को सत भक्ति बता कर गए अपने दोहों के माध्यम से वह परमात्मा कबीर जिन्हें लोगों ने एक कवि  कहकर भुला दिया वह कबीर परमेश्वर साक्षात पूर्ण परमात्मा थे वह कबीर परमेश्वर  काशी में लहरतारा नामक तालाब के एक कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और 120 वर्ष तक काशी में लीला करके गए थे इस दौरान उन्होंने रामानंद जी जो कि उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे को अपनी शरण में लिया और गोरखनाथ जी को भी अपनी शरण में लिया और गुरु नानक देव जी को भी अपनी शरण में लिया इसके अलावा संत रविदास जी को भी सत भक्ति करवाकर सतलोक ले गए और ऐसे समय में जब ना तो कोई अखबार आता था ना कोई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया था ना कोई संचार के साधन थे नाही कोई यातायात के आज के जैसे साधन थे केवल बेल गाड़ियां होती थी ऐसे समय में कबीर साहेब के 64 लाख शिष्य होना यह सिद्ध करता है कि वह साक्षात पूर्ण परमात्मा थे... जो कि सशरीर  अपने सतलोक से आकर कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और सशरीर ही अपने सतलोक को वापस चले गए थे 120 वर्ष की लीला करने के पश्चात... ...

कबीर परमेश्वर काशी में लहरतारा नामक तालाब के एक कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे

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पूर्ण परमात्मा पाप कर्म दंड को भी काट सकता है वह अपने साधक की अगर मृत्यु भी हो जाए तो भी उसे पुनः जीवित करके उसकी आयु सत भक्ति करने के लिए 100 वर्ष तक बढ़ा सकता है   वह पूर्ण परमात्मा जो अविनाशी है जो न जन्मता है ना मरता है शाश्वत है वह परमात्मा मनुष्य सदृश्य है साकार है अर्थात दिखाई देता है उसका नाम कबीर है वह सतलोक में रहता है और उसे पाने के लिए तत्वदर्शी संत से नाम उपदेश लेकर सत भक्ति करनी  होती है... हां वही कबीर परमेश्वर जो 600 वर्ष पहले काशी में एक जुलाहे की भूमिका अदा कर के गए अनेकों लोगों को सत भक्ति बता कर गए अपने दोहों के माध्यम से वह परमात्मा कबीर जिन्हें लोगों ने एक कवि  कहकर भुला दिया वह कबीर परमेश्वर साक्षात पूर्ण परमात्मा थे वह कबीर परमेश्वर  काशी में लहरतारा नामक तालाब के एक कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और 120 वर्ष तक काशी में लीला करके गए थे इस दौरान उन्होंने रामानंद जी जो कि उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे को अपनी शरण में लिया और गोरखनाथ जी को भी अपनी शरण में लिया और गुरु नानक देव जी को भी अपनी शरण में लिया इसके अलावा संत रविदास ज...