कबीर परमेश्वर काशी में लहरतारा नामक तालाब के एक कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे

पूर्ण परमात्मा पाप कर्म दंड को भी काट सकता है वह अपने साधक की अगर मृत्यु भी हो जाए तो भी उसे पुनः जीवित करके उसकी आयु सत भक्ति करने के लिए 100 वर्ष तक बढ़ा सकता है 

वह पूर्ण परमात्मा जो अविनाशी है जो न जन्मता है ना मरता है शाश्वत है वह परमात्मा मनुष्य सदृश्य है साकार है अर्थात दिखाई देता है उसका नाम कबीर है वह सतलोक में रहता है और उसे पाने के लिए तत्वदर्शी संत से नाम उपदेश लेकर सत भक्ति करनी  होती है... हां वही कबीर परमेश्वर जो 600 वर्ष पहले काशी में एक जुलाहे की भूमिका अदा कर के गए अनेकों लोगों को सत भक्ति बता कर गए अपने दोहों के माध्यम से वह परमात्मा कबीर जिन्हें लोगों ने एक कवि  कहकर भुला दिया वह कबीर परमेश्वर साक्षात पूर्ण परमात्मा थे वह कबीर परमेश्वर  काशी में लहरतारा नामक तालाब के एक कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और 120 वर्ष तक काशी में लीला करके गए थे इस दौरान उन्होंने रामानंद जी जो कि उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे को अपनी शरण में लिया और गोरखनाथ जी को भी अपनी शरण में लिया और गुरु नानक देव जी को भी अपनी शरण में लिया इसके अलावा संत रविदास जी को भी सत भक्ति करवाकर सतलोक ले गए और ऐसे समय में जब ना तो कोई अखबार आता था ना कोई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया था ना कोई संचार के साधन थे नाही कोई यातायात के आज के जैसे साधन थे केवल बेल गाड़ियां होती थी ऐसे समय में कबीर साहेब के 64 लाख शिष्य होना यह सिद्ध करता है कि वह साक्षात पूर्ण परमात्मा थे... जो कि सशरीर  अपने सतलोक से आकर कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और सशरीर ही अपने सतलोक को वापस चले गए थे 120 वर्ष की लीला करने के पश्चात... इसका प्रमाण लाखों लोगों के सामने मगहर नामक जगह पर कबीर साहेब अपने स्थूल शरीर को पुष्पों में परिवर्तित करके सतलोक को चले गए

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