कबीर परमेश्वर जी ने हनुमान जी को भी अपनी शरण में लिया और सद्भक्ति करवाकर सतलोक ले गए

कबीर परमेश्वर जो 600 वर्ष पहले काशी में एक जुलाहे की भूमिका अदा कर के गए अनेकों लोगों को सत भक्ति बता कर गए अपने दोहों के माध्यम से वह परमात्मा कबीर जिन्हें लोगों ने एक कवि  कहकर भुला दिया वह कबीर परमेश्वर साक्षात पूर्ण परमात्मा थे वह कबीर परमेश्वर  काशी में लहरतारा नामक तालाब के एक कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और 120 वर्ष तक काशी में लीला करके गए थे इस दौरान उन्होंने रामानंद जी जो कि उस समय के सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे को अपनी शरण में लिया और गोरखनाथ जी को भी अपनी शरण में लिया और गुरु नानक देव जी को भी अपनी शरण में लिया इसके अलावा संत रविदास जी को भी सत भक्ति करवाकर सतलोक ले गए और ऐसे समय में जब ना तो कोई अखबार आता था ना कोई इलेक्ट्रॉनिक मीडिया था ना कोई संचार के साधन थे नाही कोई यातायात के आज के जैसे साधन थे केवल बेल गाड़ियां होती थी ऐसे समय में कबीर साहेब के 64 लाख शिष्य होना यह सिद्ध करता है कि वह साक्षात पूर्ण परमात्मा थे... जो कि सशरीर  अपने सतलोक से आकर कमल के पुष्प पर अवतरित हुए थे और सशरीर ही अपने सतलोक को वापस चले गए थे 120 वर्ष की लीला करने के पश्चात... इसका प्रमाण लाखों लोगों के सामने मगहर नामक जगह पर कबीर साहेब अपने स्थूल शरीर को पुष्पों में परिवर्तित करके सतलोक को चले गए


 कबीर परमेश्वर जी ने हनुमान जी को भी अपनी शरण में लिया और सद्भक्ति करवाकर सतलोक ले गए
... परमात्मा बताते हैं की जब हनुमान जी समुंद्र पार कर लंका में सीता जी का पता लगाने गए थे तब सीता जी ने उनको अपना एक कंगन दिया था निशानी के रूप में राम जी को दिखाने के लिए... लंका से लौटते वक्त हनुमान जी बीच रास्ते में एक सरोवर पर स्नान करने लगे तब उन्होंने उस कंगन को एक जगह रख दिया तभी एक बंदर आया और उसने वह कंगन उठाया और वहां से आगे चल दिया फिर हनुमान जी ने उसका पीछा किया तो वह एक मुनींद्र नाम के ऋषि के आश्रम में प्रवेश कर गया और वहां रखे एक घड़े में उसने वह कंगन डाल दिया... जब हनुमान जी ने उस घड़े में देखा तो उसी प्रकार के एक जैसे बहुत से कंगन उस घड़े में रखे थे.. जब हनुमान जी ने मुनींद्र ऋषि से कहा कि मैं राम भक्त हनुमान हूं और लंका से सीता माता का पता लगाकर उनका कंगन निशानी के तौर पर लेकर निकला हूं और वह कंगन एक वानर आपके इस घड़े में डाल गया है.. पर दुविधा यह है कि इस घड़े में एक ही जैसे बहुत से कंगन हैं... तब मुनींद्र ऋषि ने कहा आप कौन से राम की बात कर रहे हैं.. तब हनुमानजी ने कहा कि राम तो एक ही है दशरथ पुत्र राम.... *तब मुनींद्र ऋषि ने कहा कि 33 करोड राम हो जा लिए जीत जीत के जग ने..अर्थात ऐसे ऐसे 33 करोड़ राम आए और ऐसे ही हर बार सीता का हरण होता है और आप यह कंगन लेकर आते हो और यह बंदर आपका कंगन चुरा कर यहां इस घड़े में डाल जाता है..और आप ऐसे ही फिर मेरे पास  कंगन लेने आते हो*.... हनुमान जी ने प्रश्न किया कि   ऋषि जी अगर ऐसा ही है तो इस घड़े से मैं कंगन लेकर भी जाता होगा तो फिर घड़े में यह कंगन शेष कैसे हैं... मुनींद्र ऋषि ने कहा कि इस घड़े की एक खास बात है कि इसमें कोई भी वस्तु डालने पर उसके जैसी प्रतिकृति बन जाती है फिर मुनींद्र ऋषि ने हनुमान जी को एक कटोरी दी जांच करने के लिए हनुमान जी ने कटोरी को घड़े में डालने पर पाया कि वह दो हो गई... हनुमान जी को चमत्कार तो लगा पर राम जी की भक्ति का रंग ज्यादा चढ़ा  हुआ होने के कारण मुनींद्र ऋषि की बातों पर विशेष ध्यान नहीं दिया और अपना कंगन लेकर चल पड़े... जब राम जी के पास पहुंचे तो रामजी ने उस कंगन को पहचान लिया कि यह सीता माता का ही है.. इस प्रकार राम रावण युद्ध हो चुका राम जी विजय हो गए और सीता जी को वापस लाकर अयोध्या लौट गए तब हनुमान जी भी उनके साथ ही चले गए... अयोध्या में राम जी और सीता जी अपनी सेना के लोगों को उपहार स्वरूप कई भेंट दे रहे थे तब सीता जी ने हनुमान जी को एक विशेष मोतियों की माला दी... हनुमान जी ने मोतियों की माला से मोती निकालकर उन्हें फोड़ फोड़ कर फेंक दिए... तब सीताजी हनुमान जी पर बहुत ही गुस्सा हो गई और उन्हें अपशब्द कह दिए उन्होंने कहा कि तू रहा वानर का वानर ही तूने अनमोल मोतियों का नाश कर दिया... तब हनुमानजी ने कहा की माता मैं तो यह देख रहा था की किसी मोती में मेरे राम है क्या जिस वस्तु में मेरे राम नहीं है वह मेरे किस काम की.. तब सीताजी ने कहा की तेरे शरीर में भी राम है क्या अगर नहीं है तो इसे क्यों साथ लेकर घूम रहा है.... तब हनुमान जी ने अपना सीना चीर कर दिखाया उसमें राम जी  दिखाई दिए... पर हनुमान जी का ह्रदय क्षुब्ध हो चुका था सीता माता की बातों से.. तब उन्होंने वहां से जाने का निर्णय कर लिया.. सीता जी के इतने शब्द बोलने पर भी राम जी ने ना तो सीता जी को रोका और ना ही हनुमान जी को वहां से जाते वक्त रोका... इस प्रकार हनुमान जी दुखी होकर तपस्या करने के लिए दूर चले गए... तब वही मुनींद्र ऋषि उनके पास आए और उन्हें फिर से वह ज्ञान बताना चाहा कि जिस राम की तू तलाश कर रहा है वह यह नहीं है वह राम तो कोई न्यारा ही है जो अविनाशी है जो परमात्मा है जिससे हम सब की उत्पत्ति हुई है... फिर हनुमान जी ने मुनींद्र ऋषि की पूरी बात सुनी
 फिर मुनींद्र रूप में परमात्मा ने हनुमान जी को सतलोक के दर्शन करवाएं और सच्चा नाम जप करने को दिया और सद्भक्ति करवा कर मोक्ष मार्ग बताया



वास्तव में पूर्ण परमात्मा चारों युगों में आते हैं सतयुग में सत सुकृत नाम से और त्रेता में मुनींद्र नाम से और द्वापर में करुणामय  नाम से और कलयुग में अपने कबीर नाम से आते हैं हां वही कबीर परमेश्वर जो 600 वर्ष पहले काशी में एक कमल के पुष्प पर आकर अवतरित हुए थे और 120 वर्ष तक लीला करके गए तत्पश्चात मगहर में अपने स्थूल शरीर को पुष्पों में परिवर्तित करके सशरीर सतलोक चले गए इसी कारण प्रतिवर्ष जेष्ठ महीने की पूर्णमासी को कबीर प्रकट दिवस मनाया जाता है जो कि इस वर्ष 5 जून को है

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